🔳 एक एक पद के लिए कई प्रत्याशी उतरते हैं मैदान में
🔳 चुनाव के समय लगती है वादों की झड़ी
🔳 हार जीत के बाद मूलभूत सुविधाओं पर साध ली जाती है चुप्पी
🔳 स्कूलों में शिक्षकों व अस्पतालों में चिकित्सकों की कमी का खामियाजा भुगत रहे ग्रामीण
[[[[[[[[[ टीम तीखी नजर की रिपोर्ट ]]]]]]]]]]]]
पंचायत चुनाव की रणभेरी बजने के साथ ही ग्राम प्रधान, क्षेत्र पंचायत व जिला पंचायत सदस्य पद के उम्मीदवारों की धड़कनें तेज हो गई है। गांव की सरकार में पद पाने के लिए प्रत्याशियों ने गांवों की भागदौड़ भी तेज कर दी है। मतदाताओं को लुभाने में दावों की झड़ी लगा दी जा रही है पर पिछले पांच वर्षों में शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चुप्पी साधे रहने के सवाल पर प्रत्याशियों का निरुत्तर हो जाना स्वाभाविक है। ग्रामीण रह रह कर सवाल खड़े कर रहे की आखिरकार क्यों संघर्ष करने का दावा करने वाले प्रत्याशी शिक्षा व स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों से मुंह मोड़ लेते हे।
पंचायत चुनाव की उल्टी गिनती शुरु होने के साथ ही विभिन्न पदों के दावेदार मतदाताओं के दिल में जगह बनाने में जुट गए हैं। गांवों के अंतिम छोर पर रहने वाले परिवारों तक पहुंचकर दावेदार बड़े बड़े दावे कर माहौल अपने पक्ष में बनाने को जुटे हुए हैं पर बुनियादी सुविधाओं की बदहाली प्रत्याशियों के दावों पर सवाल खड़े कर रही है। गांवों में स्थित कई स्कूल एकल शिक्षक के भरोसे संचालित है तो अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी व सुविधाओं का अकाल व्यवस्थाओं की पोल खोल रही है। सुविधाओं के लिए संघर्ष करने का दावा करने वाले दावेदारों के चुनाव परिणामों के बाद चुप्पी साध लेने से गांवों के लोग आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र गरमपानी व बेतालघाट की स्थिति किसी से छिपी नहीं है वहीं बेतालघाट ब्लॉक के तमाम गांवों में स्थित स्कूलों के हालात भी जगजाहिर है। अनदेखी से परेशान गांवो के लोग भी इस बार मूलभूत सुविधाओं के लिए आवाज उठाने वाले दमदार प्रत्याशी को ही जीताकर गांव की सरकार में जिम्मेदारी देने का मन बनाने लगे हैं। छड़ा गांव के विरेन्द्र सिंह बिष्ट, गरमपानी के मनीष तिवारी, खैरना के गजेंद्र सिंह नेगी के अनुसार चुनाव में जीत हार होती है पर स्थानीय मुद्दों को लेकर सबको एकजुट होकर संघर्ष करना चाहिए ताकी समस्याओं का समय पर समाधान हो सके।
